Wednesday, September 3, 2014

4.मुद्रा द्वारा रोग को दूर भगाएं....      
                   
मानव शरीर का निर्माण पंचतत्वों से हुआ है. ये पंचतत्व है- अग्नि, वायु, पृथ्वी, जल और आकाश. किसी भी शरीर की व्यवस्था हेतु इन पंचतत्वों का संतुलन होना अति आवश्यक है.मुद्रा विज्ञान के अनुसार हमारे हाथ की पांच उंगलियां भी इन्हीं पांच तत्वों का प्रतिनिधित्व करती है. आधुनिक विज्ञान ने भी स्वीकार किया है कि इन पाँचों उँगलियों से विद्युत चुम्बकीय तरंगे निकलती है. यदि इन उँगलियों पर सही मात्रा से स्पर्श अथवा दबाव दिया जाये तो पंच तत्वों का संतुलन स्थापित होता है. और कई बीमारियाँ दूर होकर शरीर स्वस्थ बनता है. उँगलियों की सही स्थति बना कर आपस में स्पर्श कराने अथवा दबाव देने से विभिन्न प्रकार की मुद्राओं का निर्माण होता है. आज यहां पर प्रमुख दो मुद्राओं का विवरण प्रस्तुत कर रहा हूं शेष मुद्राओं का अगले लेखों में विवरण देने का प्रयास करूँगा.
ज्ञान-मुद्रा:-- अंगूठे और तर्जनी के अग्र सिरों को आपस में मिलाने से ज्ञानमुद्रा का निर्माण होता है. शेष तीनों उंगलियों को सीधा, मिला हुआ तथा आरामदायक स्थिति में रखा जाता है.


ज्ञान मुद्रा करने से लाभ:-- इस मुद्रा को करने से मांसपेशियों तथा दिमाग को लाभ प्राप्त होता है. पदमासन करते समय इस मुद्रा को करने से विशेष लाभ प्राप्त होता है. किन्तु चलते, उठते, बैठते, घूमते समय भी इस मुद्रा को करके इसके लाभ अर्जित किये जा सकते है. हस्तरेखा विज्ञान के अनुसार इस मुद्रा को नियमपूर्वक करके जीवन रेखा तथा बुध रेखा (स्वास्थ्य रेखा) के विकार दूर किये जा सकते है.
इस मुद्रा का मानसिक स्थिति पर अदभुत प्रभाव देखने में आया है. इसके नियमित अभ्यास से अनिंद्रा, दिमागी असंतुलन, क्रोध, निराशा, तनाव तथा आलस्य का नाश हो जाता है. इसके साथ ही मनुष्य को मानसिक शान्ति का अनुभव होता है. चिंतन शक्ति, याददाश्त तथा एकाग्रता बढ़ाने में भी उह मुद्रा विशेष रूप से सहायक सिद्ध हुई है. निरन्तर तथा नियमित अभ्यास के द्वारा व्यक्ति अपनी छठी इन्द्रिय को भी विकसित कर सकता है.

वायु-मुद्रा:- इस मुद्रा को बनाने के लिए तर्जनी को अंगूठे के निचले यानी उदगम स्थान पर रखा जाता है. तथा अंगूठे के अग्र भाग से तर्जनी पर थोड़ा दबाव दिया जाता है. शेष तीनों उंगलियां सीढ़ी रहती है.

वायु-मुद्रा करने से लाभ:-- वायु (वात) का असंतुलन होने से शरीर कई प्रकार की बीमारियों से घिर जाता है. निरन्तर 45 मिनट तक वायु मुद्रा का अभ्यास करने से वातजन्य रोगों से मुक्ति मिलती है. हस्तरेखा विज्ञान के अनुसार इस मुद्रा के अभ्यास के द्वारा शनि पर्वत तथा शनि रेखा (भाग्य रेखा) के दोषों को दूर किया जा सकता है.
आर्थराईटिस, पैरालाइसिस तथा स्पोंदिलाइसिस जैसी पीड़ादायक बीमारियों में यह मुद्रा विशेष रूप से लाभदायक सिद्ध हुई है. शीघ्र लाभ प्राप्त करने के लिए बीमार व्यक्ति को यह मुद्रा अधिक से अधिक समय तक करनी चाहिए. वात दोष द्वारा उत्पन्न पेट दर्द, नाभि का अपने स्थान से खिसकना, हर्निया, गर्दन का दर्द, आदि में यह मुद्रा आश्चर्यजनक रूप से लाभ पंहुचाती है. वायु मुद्रा चेहरे के लकवा में भी सहायक सिद्ध होती है. प्रतिदिन 15 मिनट से 25 मिनट तक इस मुद्रा का अभ्यास करने से अच्छे परिणाम दिखाई देने लगते है. पूर्णतया लाभ हो जाने पर इस मुद्रा को रोक देना चाहिए........
शेष मुद्राएं क्रमशः...........
Pt. krishan kumar bijlwan.
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